बालू पालवंकर

भारत के पहले दलित क्रिकेटर बालू पालवंकर की कहानी बताती है कि कैसे एक सड़ी मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है।

Share This Post

यहाँ इस सड़ी हुई मछली का नाम है- ‘जातिवाद’। कहने को आप वर्ण-व्यवस्था भी कह सकते हैं। भारत में जातिभेद और जातिवाद का बहुत पुराना इतिहास रहा है। जातिवाद का यह असर भारतीय समाज के हर क्षेत्र में देखने को मिलता है। फुले, आम्बेडकर, पेरियार और गाँधी जैसे लोगों तथा अन्य कई व्यक्तियों और समूहों के लम्बे संघर्षों के बाद यहाँ की सामाजिक व्यवस्था में कुछ बदलाव आए। आज खेल-कूद के क्षेत्र में किसी भी जाति के खिलाड़ी को खेलने पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं है। आज भारत में दलित समाज से आने वाले क्रिकेट खिलाडियों में भुवनेश्वर कुमार, संजू सैमसन, युजवेंद्र चहल का दलित क्रिकेटर के रूप में नाम लिया जा सकता है। इससे पहले बालू पालवंकर, एकनाथ सोलकर, करसन घावरी और विनोद काम्बली जैसे दलित क्रिकेटरों ने भारत की तरफ से क्रिकेट खेला था।

यह मानते हुए कि भारतीय क्रिकेट टीम में भारत की अन्य जातियों की तुलना में दलित खिलाडियों की संख्या गिनती में बहुत ही कम है लेकिन, आज से एक शतक पहले के हालातों को देखें तो आज की स्थिति में ज़रूर कुछ सुधार है। पर, इसकी यात्रा इतनी आसान नहीं रही। भारतीय क्रिकेट टीम में दलित खिलाड़ियों के प्रवेश के संघर्ष को बालू पालवंकर के संघर्ष से जाना जा सकता है। जातिवाद की इस सड़ी हुई मछली ने भारतरूपी पूरे तालाब का गंदा किया हुआ था। क्रिकेट और खेल के अन्य बाकि क्षेत्र भी इनसे अछूते नहीं थे।

बालू पालवंकर को भारत के पहले दलित क्रिकेटर के रूप में जाना जाता है। इनका जन्म 19 मार्च, 1876 ई. में बम्बई (अब मुम्बई) के धाड़वाड़ में हुआ था। इनके पिता ब्रिटिश फ़ौज में सिपाही के रूप में कार्यरत थे। बालू कुल 4 भाई थे और ये इनमें सबसे बड़े थे। इनके तीन भाई पालवंकर शिवराम, विट्ठल पालवंकर और पालवंकर गणपत थे। बालू पालवंकर के अलावा ये तीनों भी क्रिकेटर थे।

baloo

कुछ ऐसे हुआ बालू पालवंकर का क्रिकेट में प्रवेश 

भारत के पहले दलित क्रिकेटर के रूप में जाने वाले बालू पालवंकर का क्रिकेट में प्रवेश अत्यंत ही रोचक ढंग से हुआ था। इतिहास में बड़े परिवर्तन रोचक ढंग से ही हुआ करते हैं। बालू पुणे  में पारसियों के एक क्रिकेट क्लब के ग्राउंड की देखभाल का काम करते थे। ये यहाँ कूड़े में फेंक दी गई गेंदों को रख लेते थे और घर में अपने भाईयों के साथ क्रिकेट खेला करते। इस तरह से इनके क्रिकेट का अभ्यास यहाँ से शुरू हुआ। कुछ समय बाद इन्होंने पारसियों के क्रिकेट क्लब को छोड़ दिया और पुणे के ही अंग्रेजों के एक क्रिकेट क्लब में काम करने लगे। बालू पालवंकर को यहाँ 4 रूपया वेतन भी मिलता था।

एक दिन अंग्रेज क्रिकेटर मिस्टर ट्रॉस क्लब में अभ्यास करने के लिए आए हुए थे। इत्तेफाक रहा  कि उस दिन गेंदबाजी करने के लिए वहाँ कोई खिलाड़ी उपस्थित नहीं था। इन्होंने बालू पालवंकर को गेंदबाजी करने के लिए बुलाया। इसके बाद जो हुआ, वह न सिर्फ बालू बल्कि भारत में क्रिकेट के परिदृश्य को भी बदलने वाला था। बालू पालवंकर ने अपनी फिरकी से अंग्रेज बल्लेबाज को चौंकाया। वे इनकी गेंदबाजी के कायल हो गए। अब बालू इस अंग्रेज क्रिकेट टीम का हिस्सा बन गए थे। नेट में अब ये नियमित गेंदबाज के तौर पर गेंदबाजी कर रहे थे। इन्होंने गेंदबाजी के और भी कई चीजें अंग्रेज स्पिनर बार्टन से सीखीं।

बालू पालवंकर

बालू को लेकर यहाँ हुआ घमासान

बालू पालवंकर के गेंदबाजी की चर्चा उस समय हर क्रिकेट क्लबों में होने लगी थी। उसी समय पुणे में ही हिन्दुओं का भी क्रिकेट क्लब था। इस क्रिकेट क्लब में बालू को बतौर गेंदबाज शामिल करने की बात हुई। इसके बाद जो होना था वही हुआ। बालू की सामाजिक पहचान यहाँ सामने आ गई। क्लब के अधिकांश खिलाडियों ने इसका विरोध किया। कई दिनों तक बालू पालवंकर को लेकर क्लब में घमासान जारी रहा।

 

बालू की इस गेंदबाजी ने उन्हें एकाएक ऊपर उठा दिया

किसी तरह से बालू पालवंकर को हिन्दुओं के क्रिकेट क्लब में शामिल कर लिया गया था। इसके बाद बालू ने फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। हिन्दुओं के इस क्लब की तरफ से खेलते हुए बालू ने 1907 ई. से लेकर 1911 ई. के बीच खेले गए मैचों में 40 विकेट लिए। इसके बाद आया बालू की टीम का विदेश दौरा। 1911 में इंग्लैंड गई भारत की टीम जब वापस मैच खेल कर आई तो अब सूरत और भी बदल गई थी। इस दौरे पर भारतीय टीम ने 14 मैचों में से सिर्फ दो मैच ही जीत पाए, लेकिन भारत के पहले दलित क्रिकेटर बालू ने इस पूरे दौरे पर कुल 114 विकेट लेकर एक नया ही कीर्तिमान बनाया।

India’s first Dalit cricketer Palwankar Baloo
Photo Credit – Hindustan Times

यहाँ से पूरी तरह से बदल गई बालू पालवंकर की ज़िन्दगी

इंग्लैंड दौरे से लौटने के बाद बालू पालवंकर का भारत में ज़ोरदार स्वागत हुआ। सभा का आयोजन कर इन्हें बकायदा सम्मानित किया गया। इससे पहले तक बालू जातिगत भेदभाव की जिल्लत को अपनी टीम के खिलाडियों के द्वारा झेलते थे। इनसे कोई खिलाड़ी हाथ नहीं मिलाता था। इन्हें एक दलित इन्हें मैच के दौरान आकर पानी पिलाता था। चाय पीने के लिए मिट्टी के बर्तन का इस्तेमाल करना पड़ता था। यह सब ऐसी बातें हैं जो आज हमारे तक पहुँच पाई हैं। अपनी सामाजिक और जातिगत पहचान के कारण इस गुदड़ी के लाल को और न जाने कितने अपमान सहने पड़े होंगे। यह अतीत का गर्भ में दबा हुआ है। आज जो लोग क्रिकेट या किसी और खेल को सिर्फ इंटरटेनमेंट और राष्ट्रवादी चश्में से देखते हैं उन्हें यह बुराई नहीं दिखेगी। ये उल्टा ऐसी बातें करने वालों को ही जातिवादी कह कर गाली देंगे। ऐसे लोगों की नज़र में इतिहासकार रामचंद्र गुहा भी जातिवादी ही लगेंगे जिन्होंने सर्वप्रथम भारतीय क्रिकेट में जातिवाद की ऐतिहासिक रूप से छानबीन की और उसे सभी के सामने लेकर आए। बालू के संघर्षों ने उन्हें जल्द ही आसमान का चमकता सितारा बना दिया। डॉ. भीमराव आम्बेडकर भी इनसे प्रभावित थे। हालाँकि, आगे चल कर आम्बेडकर और बालू पालवंकर के बीच कई मुद्दों को लेकर मतभेद भी सामने आए। बालू ने आम्बेडकर के ख़िलाफ़ चुनाव भी लड़ा।

अब खबर है कि भारत के इस पहले दलित क्रिकेटर की ज़िन्दगी पर फिल्म भी बनने वाली है। फिल्म निर्माता प्रीति सिन्हा और निर्देशक तिग्मांशु धुलिया साथ मिल कर इस फिल्म को बना रहे हैं। बालू का किरदार अजय देवगन निभाएंगे।

 


Share This Post

Also Read .....

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *