‘मेन इन ब्लू’ के लिए तालियाँ बजाने वाला यह देश ‘वूमेन इन ब्लू’ का इतिहास जानता है?

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भारतीय पुरूष क्रिकेट टीम ICC की ताज़ा रैंकिंग में वन-डे और टी-20 फ़ॉर्मेट में पहले स्थान पर जबकि टेस्ट फ़ॉर्मेट में दूसरे स्थान पर है। हालाँकि, ऊपर अगर भारतीय पुरूष क्रिकेट टीम के स्थान पर सिर्फ़ भारतीय क्रिकेट टीम भी लिखा जाता तो भी यहाँ के दर्शक समझदारी के मामले में इतने अव्वल हैं कि वे इसका मतलब पुरूष टीम से ही लेते। सामान्य दर्शकों की बात ही क्या की जाय।

कुछ समय पहले यूपीएससी के एक मॉक इंटरव्यू में किसी अभ्यर्थी से जब यह सवाल पूछा गया कि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान कौन हैं? तो सामने से जवाब आया- विराट कोहली (तब विराट कोहली भारतीय पुरूष क्रिकेट टीम के कप्तान थे) इस जवाब पर साक्षात्कारकर्ता ने अभ्यर्थी की आँखें खोलते हुए कहा कि मैंने भारतीय पुरूष क्रिकेट टीम के कप्तान का नाम नहीं पूछा था। आपने पुरुष क्रिकेट टीम के कप्तान का ही नाम लिया। महिला क्रिकेट टीम के कप्तान का नाम भी ले सकते थे।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम

यह तो छोटा-सा व्यंग्य था, अब असली मुद्दे को आगे बढ़ाते हैं।

भारत में क्रिकेट को चलाने वाली संस्था BCCI विश्व में सभी क्रिकेट बोर्ड से ज्यादा कमाई करती है। कहने का मतलब यह है कि भारतीय क्रिकेट टीम की पूरी क्रिकेट-जगत में बादशाहत कायम है और इस बादशाहत के केंद्र में है- भारत की पुरूष क्रिकेट टीम। भारत की महिला क्रिकेट टीम को पिछले कुछ वर्षों से थोड़ी इज्ज़त, थोड़ा अटेंशन और थोड़ी जगह ज़रूर मिली है। इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज की तारीख में भारत में क्रिकेट के दर्शक स्मृति मंधना, हरमनप्रीत कौर, जेमिमा रोड्रिग्स, हरलीन देओल, राधा यादव, रेणुका सिंह, ऋचा घोष, श्रेयंका पाटील का नाम जानती है।

वीमेन प्रीमियर लीग (WPL) के दूसरे सीजन को 103 मिलियन लोगों ने देखा। मतलब, ‘मेन इन ब्लू’ के शोर में ‘वीमेन इन ब्लू’ की भी चर्चा हो रही है, कम ही सही। पर, कुछ दशक पहले तक स्थिति ऐसी नहीं थी। सीधे शब्दों में कहें तो स्थिति बद-से-बदतर थी। इस स्थिति को हम एक महिला पत्रकार और फोटोग्राफर (तनुश्री भसीन) के ही शब्दों के माध्यम से जानते हैं। तनुश्री एक लेख में लिखती हैं-

“एक दशक पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। मुट्ठी भर लोग महिला क्रिकेट के मैचों को देखने आते थे। भारतीय महिला क्रिकेट टीम ख़ुद आगे बढ़ने के लिए संघर्ष कर रही थी। 80 के दशक में खेलने वाली महिला क्रिकेटरों के पास निम्नतर दर्जे तक के संसाधन नहीं थे। वे टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए बिना रेलवे टिकट के और माल ढोने वाले डब्बे में बैठ कर यात्रा करती थीं। होटलों में रुकने की तब तो बात ही नहीं थी। इन्हें रेलवे प्लेटफ़ॉर्म या फिर स्कूलों की कक्षाओं में रुकना पड़ता था। महिला क्रिकेट ने कई दशक तक संस्थानिक भेदभाव और स्पांसरशिप की कमी का सामना किया।”

अब तो स्थिति में बहुत सुधार है। अब क्रिकेट को चलाने वाली BCCI इन्हें हर मैच के लिए पुरुष टीम के बराबर भुगतान करता है। महिला क्रिकेटरों को भी वार्षिक अनुबंध के अंतर्गत रखा गया है। इनके रुकने के लिए अब 5 स्टार होटलों में व्यवस्था की जाती है। स्पांसरशिप की भी कमी नहीं हैं।

भारत में महिला क्रिकेट(वूमेन इन ब्लू) का क्या रहा है इतिहास?

भारत में क्रिकेट की शुरुआत तो 1700 ई. के आसपास हो जाती है। पर, दुनिया भर में लैंगिक भेदभाव और शोषण का प्रभाव देखिए कि यहाँ महिला क्रिकेट की शुरुआत आज़ादी के कुछ दशक बाद हो पाती है। भारत में महिला क्रिकेट को चलाने के लिए Women’s Cricket Association of India (WCAI) की स्थापना ही 1973 में होती है। भारत की महिला क्रिकेट टीम अपना पहला मैच 1976 में खेलती है। मतलब, आज़ादी के लगभग 29 वर्षों के बाद। इसके बाद कई वर्षों तक महिला क्रिकेट टीम को पुरुष टीम की तुलना में व्यापक स्तर पर भेदभाव को झेलना पड़ता है।

महिला क्रिकेट का इतिहास

स्थिति में व्यापक सुधार तब आता है जब WCAI को BCCI अपने अधीन लेती है। यह काम 2006 में किया जाता है। फिर इसके बाद 2015 में पुरूष क्रिकेटरों की तरह महिला क्रिकेटरों को भी सालाना अनुबंध दिया जाने लगता है। हालाँकि, तब भी वेतन के मामले में भेदभाव विद्यमान ही था। इस स्थिति में व्यापक सुधार (आप इसे एक बड़ी क्रांति भी कह सकते हैं) 2022 में आता है जब BCCI ऐतिहासिक फैसला लेते हुए महिला क्रिकटरों को भी पुरुष क्रिकटरों के समान वेतनमान और भुगतान करने का फैसला लेता है।


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